कुछ बनारसी सा

रंग इबादती कहु तुझे मैं, तू सहूर इबादत का दीखता है
अदा सूफियाना कहु तुझे मैं, तू ठाठ बनारसी सा दीखता है
हुस्न का दरिया कहु तुझे मैं, तू घाट बनारसी सा दीखता है
कहु जो सुर्ख  होंठ तेरे मैं, तू शाम बनारसी सा दीखता है
कहु जश्न या कहु इबादत, तू रज़ा बनारसी सा दीखता है
और कहु क्या मिलता है देख कर तुझे,
तू सुकून बनारस सा मिलता है। 

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